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Friday, March 8, 2024

दिन पुरानका आई ना, बचपन फेर भेटाई ना

दिन पुरानका आई ना,

बचपन फेर भेटाई ना.


बीत गइल उ सोना रहे,

ये चाँदी से बदलाई ना.


सर संघतीया सभे छुटल,

होई कबो भरपाई ना.


बात बात में डीह बाबा के,

किरिया केहु खाई ना.


सोहर,झूमर,झारी,चइता,

नवका लोगवा गाई ना.


होई बीयाह बस नामे के,

केहू लोढ़ा से परीछाई ना.


आपन गावँ, आपन लोग,

इ टीस हिया से जाई ना.


शहर में केतनो रह लीं,

मन बाकिर अघाई ना.


-नूरैन अन्सारी

Tuesday, July 18, 2023

एक नया इतिहास लिखेंगे

 मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे ।

हम अपने इस कालखण्ड का एक नया इतिहास लिखेंगे ।


सदियों से जो रहे उपेक्षित श्रीमन्तों के हरम सजाकर,

उन दलितों की करुण कहानी मुद्रा से रैदास लिखेंगे ।


प्रेमचन्द की रचनाओं को एक सिरे से खारिज़ करके,

ये 'ओशो' के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष लिखेंगे ।


एक अलग ही छवि बनती है परम्परा भंजक होने से,

तुलसी इनके लिए विधर्मी, देरिदा को ख़ास लिखेंगे ।


इनके कुत्सित सम्बन्धों से पाठक का क्या लेना-देना,

लेकिन ये तो अड़े हैं ज़िद पे अपना भोग-विलास लिखेंगे। 

-      

............ (अदम गोंड़वी जी।)

Sunday, May 14, 2023

माॅं जब हंसती है ( When mother laugh)

_________________

माॅं जब हंसती है

माॅं जब हंसती है तो 

हंसती हैं कलियां 

गांव की गलियां 

हंसते हैं फूल 

खेत-खलिहान, हवा और उपवन

प्रकृति हंसती है!


माॅं जब हंसती है तो

हंसती हैं कलाएं

जीवन की आशाएं 

हंसते हैं सपनें 

ताज़े भाव-विचार और नेह के धागे

भाषा हंसती है!


माॅं जब हंसती है तो 

हंसते हैं सागर 

पानी भरी गागर 

हंसते हैं बादल

पहाड़, जंगल, नदियां और झरनें 

धरती हंसती है 


माॅं जब हंसती है तो 

हंसते हैं तारे 

नदी के किनारे

हंसते हैं कण-कण 

चांद, सूरज, ग्रह और नक्षत्र

ब्रह्मांड हंसता है!


  --© राम बचन यादव

         14/05/2023


वीडियो लिंक👉https://youtu.be/SXvOQga0HEQ




Wednesday, February 22, 2023

बना बावला सूंघ रहा हूं, मैं अपने पुरखों की माटी

 नदी किनारे, सागर तीरे,

पर्वत-पर्वत, घाटी-घाटी।

बना बावला सूंघ रहा हूं,

मैं अपने पुरखों की माटी।।



सिंधु, जहां सैंधव टापों के,

गहरे बहुत निशान बने थे।

हाय खुरों से कौन कटा था,

बाबा मेरे किसान बने थे।।


ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,

दिया मर्तबा इटली को।

मगध बसा था लौह के ऊपर,

मरे पुरनिया खानों में।।


कहां हड़प्पा, कहां सवाना,

कहां वोल्गा, मिसीसिपी।

मरी टेम्स में डूब औरतें,

भूखी, प्यासी, लदी-फदी।।


वहां कापुआ के महलों के,

नीचे खून गुलामों के।

बहती है एक धार लहू की,

अरबी तेल खदानों में।।


कज्जाकों की बहुत लड़कियां,

भाग गयी मंगोलों पर।

डूबा चाइना यांगटिसी में,

लटका हुआ दिवालों से।।


पत्थर ढोता रहा पीठ पर,

तिब्बत दलाई लामा का।

वियतनाम में रेड इंडियन,

बम बंधवाएं पेटों पे।।


विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,

जाकर मरा सर्बिया में।

याद है बसना उन सर्बों का

डेन्यूब नदी के तीरे पर।।


रही रौंदती रोमन फौजें

सदियों जिनके सीनों को।

डूबी आबादी शहंशाह के एक

ताज के मोती में।।


किस्से कहती रही पुरखिनें,

अनुपम राजकुमारी की।

धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,

भेड़ बकरियां दलदल में।।


कौन लिखेगा इब्नबतूता

या फिरदौसी गजलों में।

खून न सूखा कशाघात का,

घाव न पूजा कोरों का।।


अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,

चेतक बेदुल घोड़ो का।

जुल्म न होता, जलन न होती, 

जोत न जगती, क्रांति न होती।

बिना क्रांति के खुले खजाना,

कहीं कभी भी शांति न होती।


©रमाशंकर यादव 'विद्रोही' | कॉमरेड विद्रोही




Saturday, February 11, 2023

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

 



तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं 

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 


मैं बे-पनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ 

मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं 


तिरी ज़बान है झूटी जम्हूरियत की तरह 

तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं 


तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ 

अदीब यूँ तो सियासी हैं पर कमीन नहीं 


तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर 

तू इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं 


बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ 

ये मुल्क देखने लाएक़ तो है हसीन नहीं 


ज़रा सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो 

तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं


- दुष्यंत कुमार




Friday, January 27, 2023

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई (Socialism Babua, came slowly)

 समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई


हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...



नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...


गाँधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...


काँगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...


डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...


वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...


लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...


महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...


छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...


परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...


धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई


समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई


------   गोरख पांडेय


Wednesday, December 28, 2022

इहां जतिए पहिचान बा

 

_________________________


जात में जात इहां जतिए प्रधान बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


जात में जात जइसे केला के पतिया

छिलका पियाज के जस मोथा के घसिया

जात के मान इहां जतिए अभिमान बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


पानी के जात इहां मटका के जतिया

भात के जात इहां रोटियो के जतिया

जात से बड़ा-छोट जतिए भगवान बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


पीड़ित भयल इहां जतिए से मानव

जतिए से मानव कहाइल दनुज-दानव

चरित-गुनहीन देखा तबो सम्मान बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


नेह-मानवता के जाति गइल खाई

हक-अधिकार गयल जाति से लुटाई

जतिए से हमनीं के मिटल पहिचान बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


मिलल अजादी बाकी के के अजाद भयल

बंधुआ अजादी अ बंधुआ अधिकार भयल

जतिए अजाद भइल जतिए गुलाम बा

इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा।


     कवि  -- राम बचन यादव


Saturday, December 24, 2022

ईश्वर की सत्ता, सत्ता का ईश्वर

 

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ईश्वर वो कर्जा है

जिसे ग़रीब आजीवन भरता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो परदा है

जो बेबस को नंगा करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो बरधा है

जो हाड़ चबाया करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो गरदा है

जो सपने धूमिल करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो मरदा है

जो स्त्रियों पर ज़ुल्म करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर कोरा परचा है

जिसे नाहक़ भरना पड़ता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर ईजाद किया वो सत्ता है

जो मज़लूमों का शोषण करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर झूठा दरजा है

जो तर्क से हमेशा डरता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर चंद लोगों का भत्ता है

जो कामचोरी करता है और बेगारी में मरता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर भगवा कत्था है

जो हरे को ख़ूनी करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो ठर्रा है

जो ज़ेब को ढ़ीली करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर वो पत्ता है

जो डाली से बग़ावत करता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर इतना सस्ता है

जिसे ज़ेब में पंडा रखता है

सत्ता की तरह!


ईश्वर ऐसा धंधा है

जिस पर ग्राहक मरता है 

सत्ता की तरह!


~बच्चा लाल 'उन्मेष'

('कौन जात हो भाई' कविता संग्रह से...) 

"ईश्वर यदि होता तो वो अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले नास्तिकों को पैदा नहीं करता।"

पेरियार रामास्वामी नायकर

Tuesday, December 6, 2022

ना चाही हमनीं के धरम-करम


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ना चाही हमनीं के धरम-करम 

ना मंदिर-मसजिद चाही रे 

हक मानवता प्यार अ इज्जत 

अब जनता के चाही रे! 


ना अच्छा लागें राम-लखन  

ना अच्छा किसन-मुरारी रे 

पेट के भूख बड़ी होखेले 

अल्लाह-ईसा से  प्यारी रे !


झूठ-मूठ सब वेद-पुरान 

गीता-कुरान-बाइबिल रे 

तोहनीं ई सब पैदा कइके 

भइला बड़का काबिल रे! 


एक तवा कै रोटी तोहनीं 

का मोटी का छोटी रे 

जनता के भरमा के तोहनीं 

काटत बाड़ा बोटी रे! 


जनता के मूरख बनवला 

रचला काबा - कासी रे 

अपने चपला दूध -भात

हमनीं के सब बासी रे! 


अब त जनता बूझ गइल बा 

बाड़ा बजर कसाई रे 

एक दिन होई जरूर इहां से

तोहनीं के विदाई रे!


कविRambachan Yadav (रामबचन यादव)

Tuesday, November 29, 2022

नहीं बचेंगी बेटियां


अब मोमबत्तियां जलाने से 

नहीं बचेंगी बेटियाँ

अब अफ़सोस करने से

नहीं बचेंगी बेटियाँ

अब नारी देह पर  

प्रलाप करने से 

नहीं बचेंगी बेटियाँ

अब खुद को कोसने से 

नहीं बचेंगी बेटियाँ

अब नारा लगाने से 

नहीं बचेंगी बेटियाँ

अब विक्षिप्त मनोवृति के 

ग़ोश्तपिशाच नराधम 

कामुक पिपासुओं के 

लिंगध्वज को चौराहों पर 

सरेआम काटकर लटकाने से 

बचेंगी बेटियाँ !


कवि- मंजुल भारद्वाज

Saturday, October 8, 2022

हिन्दू जाग गया है

 

बड़ा शोर है 

हिन्दू जाग गया है 

हिन्दू जाग गया है

हिन्दू जाग गया है

पर कोई बता नहीं रहा ....

कौन सा हिन्दू जाग गया?

मोहम्मद गौरी को बुलाने वाला 

जयचंद जाग गया 

या 

गाँधी का हत्यारा गोडसे जाग गया?

औरत को पूजने वाला 

हिन्दू जाग गया

या 

जुए में द्रौपदी को दांव पर लगाने वाला 

हिन्दू जाग गया?

वर्णवाद का शिकार हिन्दू जाग गया

ब्राह्मणों का दरबान बना 

राजपूत वाला हिन्दू जाग गया 

ब्राह्मणों का कारोबार सम्भालने वाला 

वैश्य हिन्दू जाग गया 

या 

शुद्र बना हिन्दू जाग गया?

स्वाभिमान, स्वावलंबन, रोजगार छोड़ 

एक-एक दाने की भीख लेने वाला 

हिन्दू जाग गया?

एक-एक सांस को तरसता 

घर-घर मरघट में मरने वाला 

हिन्दू जाग गया?

संविधान से बराबरी का अधिकार 

लेने वाला हिन्दू जाग गया 

या 

संविधान सम्मत वोट से 

मनुवादी सत्ता चुनकर 

वर्णवाद में पिसने वाला 

हिन्दू जाग गया?

बेचारे हिन्दू-हिन्दू बोलकर 

मरे जा रहे हैं ..... 

ये नाम इन्हें इस्लाम वालों ने दिया 

मुसलमानों की दी ....

हिन्दू की पहचान पर गर्व कर रहे हैं 

और हिन्दू नाम देने वाले 

मुसलमान से नफ़रत कर रहे हैं 

ये कौन से हिन्दू जाग गए है?

दरअसल हिन्दू नहीं जागे 

भीड़ जाग गई है 

अंधी भीड़ .....

वर्णवाद की गुलामी से जिसे 

संविधान ने आज़ादी दिलाई थी 

वो भीड़ फिर से वर्णवाद को 

सत्ता पर बिठाने के लिए जाग गई है 

वो भीड़ जाग गई है 

जो ब्राह्मणों के राज में 

वर्णवाद में राजपूत 

वैश्य और शुद्र बनकर 

शोषित होना चाहती है 

जो शोषण को भारत की संस्कृति मानती है 

वो जो ब्राह्मणवाद की पालकी ढ़ोने को 

मोक्ष मानती है 

वो भीड़ जाग गई है ....

आर्य प्रसन्न हैं 

मोदी संविधान को नेस्तनाबूद कर 

ब्राह्मणों की सत्ता के दूत बने हैं 

छोटी जाति के एक व्यक्ति के लिए 

इससे बड़ी बात क्या हो सकती है 

जिसे सदियों तक अछूत माना गया 

वो गांधी, आंबेडकर और नेहरु के संविधान से 

देश का प्रधानमंत्री बन सकता है 

वो हिन्दू जाग गया है  

जो बराबरी नहीं 

ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को 

भारत की संस्कृति मानता है 

और 

संविधान सम्मत राज को गुलामी !

 

कवि ~ मंजुल भारद्वाज

Tuesday, July 26, 2022

वापस यात्रा (Return Travel)

                         


जो दुनिया में आया है, वो एक दिन वापस जाएगा,

संसार के इस शाश्वत सच को, कोई झुठला ना पाएगा ।


पैसा बहुत कमाया था, ऐशो आराम का जीवन था,

इस पैसे के दम पे बता, धर्म से क्यूँ मुँह फेरा था ।


हजारों रोज आते हैं, हजारों चले भी जाते हैं,

उँगलियों पे गिन लो उनको, जो नाम अमर कर जाते हैं ।


कोई जल्दी से हारा है, कोई लंबी रेस का घोड़ा है,

पर इस रिटर्न जर्नी में, हमने सब कुछ यहीं पे छोड़ा है ।


किसी की अंतिम यात्रा में, श्मशान घाट हो आये थे,

कभी ये आखिरी मंजिल होगी, ये ना सोच पाए थे ।


हर शोक सभा में जो बात बार-बार दोहराई थी,

बात वो इतनी सीधी सरल थी, क्यों समझ ना आई थी ।


पैसे की बात क्या करेंगे, शरीर ही यहाँ छोड़ जाना है,

जब वक्त आएगा जाने का, रिटर्न टिकट कटाना है ।



Sunday, July 17, 2022

शहर बसाकर गाँव ढूंढते हैं

 


शहर घूमता है काले चश्मे लगा के,

गाँव अब भी नजर मिला लेता है


शहर बीमार होता है दवाओं से,

गाँव बीमारी में भी खुद को जिला लेता है


शहर के घर से लोग खाली हाथ लौट जाते हैं,

गाँव में लोग बर्तन भी खाली नहीं लौटाते हैं


नकली चेहरे गाँव में भी हैं मगर उनकी आंखें सच्ची हैं,

शहर की इतनी शोर से आटा-चक्की की फुक-फुक अच्छी है


गाँव में देखो मुस्कुराती हैं फूलगोभीयां,

शहर ने पहले बाल रंगें फिर हरी सब्जियां


पर देखा है मैंने थोड़ा-सा शहर घुस रहा है गाँव में,

कोई कर रहा है चुपके से छेद नाव में,

एसी(AC) की कमी गिना रहा है पीपल की छांव में,

पहिया पलायन का बांध लिया है पाँव में


मेरी दुआ है खूब तरक्की करें यह जमाना,

मगर गाँव की लाश पर शहर मत उगाना

 


कार बनाने वाले चल के, पाँव से आये थे ।

ये शहर बसाने वाले भी चल के, गाँव से आये थे ।।

 

शहर बसाकर गाँव ढूंढते हैं,

अजीब पागल हैं,

हाथ में कुल्हाड़ी लेकर छाँव ढूंढते हैं

Tuesday, July 12, 2022

अंतिम यात्रा (Last Journey)

 

 (Miss you राधे भाई) 


था मैं नींद में और
मुझे इतना
सजाया जा रहा था....

बड़े प्यार से
मुझे नहलाया जा रहा था....

ना जाने
था वो कौन सा अजब खेल
मेरे घर में....

बच्चों की तरह मुझे
कंधे पर उठाया जा रहा था....

था पास मेरा हर अपना
उस वक़्त....

फिर भी मैं हर किसी के
मन से
भुलाया जा रहा था...

जो कभी देखते भी न थे

मोहब्बत की निगाहों से....

उनके दिल से भी प्यार मुझ पर
लुटाया जा रहा था...

मालूम नहीं क्यों
हैरान था हर कोई मुझे
सोते हुए देखकर....

जोर-जोर से रोकर मुझे
जगाया जा रहा था...

कांप उठी मेरी रूह

वो मंज़र देखकर....

जहां मुझे हमेशा के लिए

सुलाया जा रहा था....

मोहब्बत की इन्तहा थी

जिन दिलों में मेरे लिए....

उन्हीं दिलों के हाथों,
आज मैं जलाया जा रहा था!!!

इस दुनिया में कोई किसी का हमदर्द नहीं होता,

लाश को शमशान में रखकर अपने लोग ही पूछते हैं।


          "और कितना वक़्त लगेगा"

                                                        


 


Monday, July 11, 2022

उठो लाल अब आँखें खोलो

 

उठो लाल, अब आँखें खोलो

पानी लायी हूँ, मुँह धो लो


बीती रात कमल-दल फूले  

उनके ऊपर भौंरे झूले  

चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर   

बहने लगी हवा अति सुंदर  


नभ में न्यारी लाली छायी

धरती ने प्यारी छबि पायी   

भोर हुआ सूरज उठ आया  

जल में पड़ी सुनहरी छाया  


ऐसा सुंदर समय न खोओ  

मेरे प्यारे अब मत सोओ

                           कवि - अयोध्यासिंह ‘हरिऔध’

Wednesday, July 6, 2022

कद्दू जी की चली बारात


कद्दू जी की चली बारात

हुई बताशों की बरसात


                                                                    

                                                बैगन की गाड़ी के ऊपर

                                                बैठे कद्दू राजा,

                                                शलजम और प्याज ने मिलकर

                                                खूब बजाया बाजा

मेथी, पालक, भिंडी, तोरई,

टिंडा, मूली, गाजर,

बने बाराती नाच रहे थे

आलू, मटर , टमाटर


                                                   

                                         कद्दू  जी हँसते-मुस्काते

                                         लौकी दुल्हन लाए,

                                         कटहल और करेले जी ने

                                         चाट-पकौड़े खाए

प्रातः पता चली यह बात

सपना देखा था यह रात


कद्दू जी की चली बारात

हुई बताशों की बरसात 


कवियित्री : शांति अग्रवाल